
सफलता की कहानी प्राकृतिक खेती और नर्सरी उत्पादन से बढ़ी किसान की आय प्राकृतिक खेती और नर्सरी से वार्षिक आय 1.20 लाख से बढ़कर 2.50 लाख हुई
संवाददाता धनंजय जोशी
जिला पांढुरना मध्य प्रदेश
यह कहानी है विकासखण्ड सौसर के ग्राम सर्रासांवरी, ग्राम पंचायत रंगारी के निवासी कृषक श्री सन्दीप घोरमारे की। जिनके पास कुल 1.052 हेक्टेयर कृषि भूमि है। पूर्व में वह पारम्परिक खेती करते थे। अपने खेत में मात्र कपास की एवं अरहर लगाकर दो गाय और दो बैल के सहारे अपनी जीविका चला रहे थे। इससे उन्हें ज्यादा लाभ प्राप्त नहीं हो रहा था और खेती का व्यय बढ़ने की चिंता होने लगी थी। उस समय उन्हें मुश्किल से 1 से 1.20 लाख रुपये की वार्षिक आय प्राप्त होती थी, जिससे घर चलाने में काफी कठिनाई होती थी।

फिर एक दिन उनका सम्पर्क कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के अधिकारियों से हुआ। उन्होंने उन्हें बताया कि खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए खेती में लागत कम करना आवश्यक है और इसके लिए प्राकृतिक खेती अपनाने की सलाह दी। उनकी सलाह को अपनाते हुए उन्होंने अपने एक एकड़ खेत में प्राकृतिक खेती शुरू की। आत्मा योजनांतर्गत उन्हें सरसों का प्राकृतिक खेती प्रदर्शन दिया गया। इस दौरान उन्हें जीवामृत, बीजामृत, दशपर्णीय अर्क, घनजीवामृत और नीमास्त्र आदि बनाने की विधि तथा उनके उपयोग की जानकारी भी दी गई।
इन सभी को उन्होंने स्वयं तैयार कर बिना किसी अतिरिक्त खर्च के एक एकड़ खेत में उपयोग किया, जो सफल रहा।
इसकी सफलता को देखकर उन्होंने अपने खेत में जीवामृत ट्यूब लगवाया और बड़ी मात्रा में जीवामृत तैयार कर पूरे खेत में इसका उपयोग करना शुरू किया, जिससे उन्हें अच्छा लाभ प्राप्त हुआ। इसके साथ ही उन्होंने नर्सरी में पौध तैयार करने का कौशल भी सीखा। प्रारंभ में उन्होंने एक कमरे के नेट हाउस में मिर्च और बैगन के पौध तैयार कर बेचने का कार्य किया। इसके बाद दूसरे वर्ष में तीन नेट हाउस में मिर्च, बैगन के साथ गोभी और टमाटर के पौध तैयार कर बेचने लगे, जिससे उनकी आय में अच्छी वृद्धि हुई। वर्तमान में उनके पास पांच पशु भी हैं।
पहले खेती से उन्हें लगभग 1 से 1.20 लाख रुपये तक की आय होती थी, लेकिन आज प्राकृतिक खेती अपनाने और नर्सरी पौध तैयार कर बेचने से उनकी आय में लगभग एक लाख रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी हुई है। वर्तमान में उनको वार्षिक शुद्ध आय लगभग 2.50 लाख रुपये हो गई है।
आज उनकी भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हुई है और मिट्टी के स्वास्थ्य में भी सुधार आया है। खेती से उन्हें अच्छा लाभ प्राप्त हो रहा है। आसपास के किसान भी उनसे तैयार पौधे लेने आते हैं। उनकी लहलहाती फसल को देखकर वे प्राकृतिक खेती के तरीके सीखने के लिए प्रेरित हो रहे हैं और प्राकृतिक खेती अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
